तब नीना गुप्ता ने बेटी मसाबा से कहा था कि तुम्हारी शक्ल हिरोइन वाली नहीं

नीना गुप्ता बॉलिवुड की एक ऐसी अदाकारा हैं, जिसने हमेशा अपनी शर्तों पर जिंदगी को जिया है। अब उनकी जिंदगी की एक खास झलक देखने को मिलेगी, उनकी बिटिया और जानी-मानी फैशन डिजाइनर मसाबा गुप्ता की बायॉपिक सीरीज 'मसाबा मसाबा' में। इस सीरीज में मसाबा और नीना अपनी भूमिकाएं खुद ही निभा रही हैं। इसी सिलसिले में नीना गुप्ता ने इस खास बातचीत में कई बातें बताई। जब आपको मसाबा की बायॉपिक की खबर मिली, तो मन में क्या खयाल आया? क्या अपनी निजी जिंदगी की बातें पब्लिक में आने को लेकर हिचक थी? पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि ये क्या बना रहे हैं। ये डॉक्यूमेंट्री होगी या क्या होगा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आइडिया बड़ा अच्छा लग रहा था, लेकिन वह एक तीस साल की लड़की है, तो उसका क्या बनाएंगे? फिर, ये चिंता थी, जो आप कह रही हैं, जैसे मसाबा भी कहती है कि हमारा बहुत कुछ प्राइवेट है, जो हम सबके सामने लाना नहीं चाहते। लेकिन लिखते वक्त ऐसी कोई चीज आई ही नहीं। मैं, मसाबा, सोनम नायर (डायरेक्टर) और राइटर्स साथ बैठे। हमने अपनी जिंदगी की कुछ बातें उन्हें बताईं और करते-करते एक स्टोरी बन गई। उसमें कुछ चीजें फिक्शनलाइज भी की गई हैं। बाकी, जो रियल लाइफ है, वह वैसे ही रखा है। जैसे वह सीन है कि दुकानदार कहता है कि मसाबा लड़की नहीं, देश है, यह मसाबा के साथ सच में हुआ था। ऐसी बहुत सी चीजें रियल हैं और बहुत चीजें फिक्शन हैं। जब ये पता चला कि मसाबा ऐक्टिंग करेंगी, तो क्या जेहन में आया? क्या पहले कभी उन्होंने ऐक्टर बनने की ख्वाहिश जताई थी? हां, हां, जब वह 14-15 साल की थी, तो उसने कहा कि मुझे ऐक्ट्रेस बनना है, तो मैं तो बहुत घबरा गई। मैंने उसको समझाया कि देखो, मुझे वैसे कोई ऐतराज नहीं है, पर आपकी जैसी शक्ल है, बुरी शक्ल नहीं है, लेकिन अलग है। वह हिंदी फिल्म की हिरोइन वाली शक्ल नहीं है। आपका फिगर और लुक भी वैसा नहीं है, तो आपको बहुत कम काम मिलेगा, भले ही आप अच्छी ऐक्टिंग करो। ये मैंने उसको समझाने की कोशिश की, लेकिन टीनेज में ऐक्टिंग में इतना ग्लैमर दिखता है कि कोई समझने को ही तैयार नहीं होता। इसलिए, काफी टाइम लगा। वह बहुत अपसेट थी कि मम्मी नहीं चाह रही। फिर, पता नहीं कैसे ये बात उसे समझ आ गई और वह डिजाइनर बन गई। जब यह ऑफर आया, तो मसाबा बहुत खुश थी। कहीं न कहीं वह हमेशा ऐक्टिंग करना चाहती थी, लेकिन मुझे फिर घबराहट हुई कि पता नहीं कैसी ऐक्टिंग करेगी, लेकिन जब मैंने उसका काम देखा, तो मुझे बहुत गर्व हुआ। मैंने उसे जाकर बोला- आई एम सॉरी कि मैंने तुम्हें इतने साल तक ऐक्टिंग नहीं करने दी। ऐसा क्यों हैं कि हमने ऐक्ट्रेस की एक खास छवि बना रखी है, जिसे तोड़ नहीं पा रहे हैं। क्यों हर तरह की औरत फिल्मों में नहीं एक्सेप्ट नहीं की जा सकती? ऐसा इसलिए है कि हमारे समाज में ही ऐसा है। आप मैट्रिमोनियल विज्ञापनों में देखिए, सबको बस गोरी लड़की चाहिए। किसी ने लिखा है कि काली या सांवली लड़की चाहिए? हमारी सोसायटी में ही औरत की खूबसूरती का मापदंड एक प्रकार का होता है और उसकी ही सब तारीफ करते हैं। ये फिल्म इंडस्ट्री की दिक्कत नहीं है। फिल्मवाले वही बनाते हैं, जो समाज में होता है। अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। कई ऐसी ऐक्ट्रेसेज हैं, जो टिपिकल नहीं हैं, फिर भी बहुत सक्सेसफुल हैं। हमारी सोसायटी भी बदल रही है। अगर ये सीरीज लोगों को पसंद आती है, तो और बहुत सी ऐसी लड़कियों का हौसला बढ़ेगा। जैसा सीरीज में दिखाया गया है, क्या फिल्म इंडस्ट्री वाकई महज दिखावे की दुनिया है? जैसे, फराह खान वाला सीन है कि वह आपकी तारीफ खूब करती हैं, लेकिन कास्ट खुद को कर लेती हैं? मेरे साथ बहुत बार ऐसा हुआ है और अभी भी ऐसा होता है। टीवी में भी हुआ है। चूंकि मेरे या मेरे काम के प्रति एक सम्मान है, तो अगर मैं फोन करूं कि मुझे सीरियल बनाना है, तो मुझे मिलने बुलाते हैं। बहुत अच्छे से मिलते हैं, तारीफ करके मुझे चने की झाड़ पर चढ़ा देते हैं कि आप तो महान हैं, लेकिन काम नहीं देते। अब काम क्यों नहीं देते, ये मैं बहुत वक्त के बाद समझी हूं कि ये फिल्म लाइन एक बिजनेस है। यहां कोई मुझे इसलिए रोल नहीं देगा, क्योंकि मैं बहुत अच्छी इंसान हूं या बेचारी ने बड़े दिन से काम नहीं किया। कास्टिंग उस हिसाब से होती है कि यह ऐक्टर आजकल ज्यादा चल रहा है, आजकल इसका ज्यादा भाव है। इससे हमें बुरा नहीं मानना चाहिए। एक सीन में मसाबा कहती हैं कि आपने उन पर शादी का दबाव डाला, क्योंकि आप नहीं चाहती थीं कि वे आप वाली गलती करें। क्या सिंगल मदर होने के अपने फैसले को आप गलती मानती हैं? नहीं, बिल्कुल वैसे तो मैं नहीं सोचती, जैसा उसमें दिखाया गया है। वह थोड़ा सा जोड़ा गया है, लेकिन सिंगल पैरंट्स हमेशा थोड़ा ज्यादा प्रोटेक्टिव होते हैं। वही मेरे साथ रहा है। मैं ये चिंता नहीं करती कि जो मेरे साथ हुआ, वह न हो, पर कहीं न कहीं मैं थोड़ी रुढ़िवादी हूं। कहीं न कहीं मेरे संस्कार उस जमाने के हैं। वैसे, मैंने अपने आप को बहुत बदला है, पर अभी तो कुरेदो, तो कहीं न कहीं वही निकलता है। मैं वैसी हूं, तो वह भी दिखाया है और कहीं-कभी थोड़ा बढ़ाकर भी दिखाया है।


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